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पृथ्वी राज चौहान को बंदी बनाने के बाद संयोगिता - हिंदी कहानियां


शिहाबुद्दीन गौरी(मोहम्मद गौरी) और गियासुद्दीन गौरी नाम के दो भाई अफगान शासक थे जो युद्ध प्रेमी थे जिनका काम अन्य देशों की अलौकिक संपदा लूटना, सुंदर स्त्रियों के साथ समागम और मुस्लिम धर्म का प्रसार करना था। जिन्हें भारत के अतुल्य संपदा का पता चला। गियासुद्दीन गौरी ने छोटे भाई शहाबुद्दीन गौरी को आदेश दिया की जाओ भारत पर आक्रमण करो भारत की सुंदर स्त्रियां लूट कर लाओ, भारत की अतुल्य संपदा को लूट कर लाओ, भारत के मंदिर खंडित कर दो।


शहाबुद्दीन गौरी उर्फ मोहम्मद गौरी इसलिए आक्रमण करने के लिए निकल पड़ा प्रारंभ में भारत के अनेक छोटे-मोटे राज्यों को जीतने में सफलता हासिल की अब उसने पृथ्वीराज चौहान के राज्य पर चढ़ाई किया । 1191ईसवी में तराइन के प्रथम युद्ध में मोहम्मद गौरी का सामना एक बार फिर पृथ्वीराज चौहान से हुआ लेकिन उसे हार का सामना करना पड़ा पृथ्वीराज चौहान ने उसे दया की भीख मांगने पर छोड़ दिया


मोहम्मद गौरी फिर से अफगान चला गया लेकिन उसके अंदर प्रतिशोध की ज्वाला भड़क रही थी भाई गयासुद्दीन गौरी से परामर्श के बाद एक बार फिर विशाल सेना के साथ युद्ध स्थल की ओर बढ़ा इस बार वह पूरी तैयारी के साथ आया हुआ था ऐसे में उसे राजा जयचंद की सहायता मिली।



जयचंद कौन था- पड़ोसी राजा के कार्यक्रम में पृथ्वीराज चौहान और राजा जयचंद की पुत्री संयोगिता आए हुए थे संयोगिता की सहेलियों ने बताया कि यह वीर सम्राट पृथ्वीराज चौहान है जिन्होंने अपनी तलवार से आक्रांत मचाया हुआ है संयोगिता पृथ्वीराज चौहान को देखकर मंत्रमुग्ध हो गई पृथ्वीराज चौहान की नजर जब संयोगिता पर पड़ी वह भी उस पर मंत्रमुग्ध हो गए उन दोनों के बीच पारस्परिक प्रेम संबंध स्थापित हो गए राज्य वापस लौटने पर संयोगिता ने पिता जयचंद से विवाह की इच्छा व्यक्त की लेकिन राजा जयचंद इस विवाह प्रस्ताव को अपना अपमान समझते थे क्योंकि पुत्री का विवाह करने के बाद उन्हें पृथ्वी राज चौहान के सामने हमेशा झुकना पड़ता।


इसलिए उन्होंने इस विवाह को नामंजूर कर दिया और संयोगिता के विवाह के लिए भव्य आयोजन करवाया और देश विदेश के राजाओं को विवाह के लिए आमंत्रित किया दरबार के बाहर द्वारपाल के स्थान पर उन्होंने पृथ्वीराज चौहान की मूर्ति लगवाई ताकि पृथ्वीराज चौहान को अपमानित किया जा सके।


संयोगिता ने अपनी सखी से कहा हे सखी इस खबर को पृथ्वीराज चौहान के पास पहुंचा दो क्योंकि मैंने उन्हें अपना पति स्वीकार कर लिया है संयोगिता जब वरमाला लेकर दरबार में उपस्थित हुई तो उसने पृथ्वीराज चौहान की मूर्ति देखी जो दरबार के बाहर एक द्वारपाल की जगह रखी हुई थी जिसे रखने का उद्देश्य पृथ्वीराज चौहान को अपमानित करना था संयोगिता ने सभी गणमान्य राजाओं को छोड़कर पृथ्वीराज चौहान की मूर्ति पर वरमाला डाल दी।





पृथ्वीराज चौहान को जब इसकी सूचना मिली तो वह अपने साथ हजारों सैनिकों को लेकर राजा जयचंद के दरबार में पहुंच गए और संयोगिता को अपने साथ लेकर राज्य वापस लौट आए राजा जयचंद भरे दरबार में अपने इस अपमान को सह ना सके और उन्होंने मोहम्मद गौरी को सहायता का आश्वासन दिया।


तराइन का द्वितीय युद्ध शुरू


मोहम्मद गौरी जिसने जीत की उम्मीद छोड़ दी थी राजा जयचंद द्वारा पृथ्वीराज चौहान के सारे गुप्त राज को जानने के बाद उसने फिर से एक बार फिर पानीपत के लिए आगे बढ़ा मोहम्मद गौरी ने इस बार घुड़सवार की संख्या बढ़ा दी थी इस युद्ध में उसने पृथ्वीराज चौहान को करारी शिकस्त दी


राजा जयचंद ने अपने सैनिक पृथ्वीराज चौहान की सेना में मिला दिए थे जो पृथ्वीराज चौहान के सैनिकों को मार रहे थे जिससे सेना में भगदड़ मच गई अन्य राजाओं को मना किया कि वे पृथ्वी राज चौहान का साथ नहीं दे।पृथ्वीराज चौहान जो एक घोड़े में भागने की कोशिश कर रहे थे अंततोगत्वा पकड़े गए मोहम्मद गौरी उन्हें पकड़कर गजनी ले गया साथ में अन्य सरदारों और चंदबरदाई को भी अपने साथ ले गया।


संयोगिता और अन्य सुंदर दासियों को पकड़ने के लिए सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को प्रभारी पद सौंपा गया, सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक अजमेर पहुंच गया लेकिन वहां पृथ्वीराज चौहान का किला इतना मजबूत बनाया गया था जिसमें एक और नदी थी एक और खाई थी सामने थी किले की मजबूत दीवार जिसे तोड़ना मुश्किल था कुतुबुद्दीन ऐबक ने काफी प्रलोभन दिया किले का द्वार खोल दिया जाए लेकिन राजमहल की स्त्रियों ने एक ना सुनी अंत में कुतुबुद्दीन ऐबक ने निर्णय लिया कि किले के बगल वाली खाई को अजमेर के नागरिकों को मारकर उनकी लाशों से पाट दिया जाए उन लाशों में हाथियों को चढ़ाया जाए और फिर किले की दीवारों को तोड़ा जाए कुतुबुद्दीन ऐबक के इस आचरण से राजमहल की महिलाएं व्याकुल हो उठी और उन्होंने अपनी इज्जत को बचाने के लिए जौहर की तैयारियां शुरू कर दी।



कुतुबुद्दीन ऐबक जो संयोगिता के सौंदर्य का स्वाद चखना चाहता था आग की लपटों को देखकर वह व्याकुल हो उठा और उसने संयोगिता के भाई धीरचंद्र को पकड़ के किले की दीवार के सामने खड़ा कर दिया ताकि संयोगिता को अपने भाई पर तरस आ जाए और किले के द्वार खोलने के आदेश दे दे लेकिन किले के दरवाजे फिर भी नहीं खुले संयोगिता के भाई धीर चंद्र की मौत हो गई हाथियों के पैरों में कुचल जाने के बाद ।


काफी मशक्कत के बाद किले की दीवार जाकर टूटी तो अंदर देखा तो वहां चारों तरफ आग की लपटें जल रही थी महल में एक भी स्त्री का नामोनिशान नहीं था सभी जौहर कर गई थी।


उधर गजनी में पृथ्वीराज चौहान ,संयोगिता की मौत की खबर सुनने के बाद आक्रोशित हो उठे आंखें नीची ना करने के कारण मोहम्मद गौरी गुस्सा हो गया उसने हुकुम दिया है कि इस काफिर की दोनों आंखें गरम सलाखों से फोड़ दी जाए इस प्रकार पृथ्वीराज चौहान अंधे हो गए उन्हें चंदबरदाई के साथ जेल में ठूंस दिया गया।



पृथ्वीराज चौहान जेल के अंदर ही अपने शब्दभेदी बाण का अभ्यास किया करते थे जेल के कर्मचारियों ने यह सूचना मोहम्मद गौरी के भाई गियासुद्दीन गौरी को जाकर बताई उस समय मोहम्मद गौरी ईरान आक्रमण के लिए गया था गियासुद्दीन गौरी उनकी इस कुशलता को अपनी आंखों से देखना चाहता था इसलिए उसने पृथ्वीराज चौहान और चंदबरदाई को दरबार में बुलाया गियासुद्दीन गौरी ने आदेश दिया कि चंदबरदाई के शब्दों को सुनकर पृथ्वीराज चौहान, चंद्रवरदाई के सीने पर अपने शब्दभेदी बाण की कार्य कुशलता का परिचय दें। चंदबरदाई ने मौत नजदीक आते देख यह भाप लिया था कि अब ना तो मैं बचूंगा ना पृथ्वीराज चौहान इसलिए उन्होंने एक दोहा बोला-



चंदबरदाई के इस दोहे को सुनकर पृथ्वीराज चौहान ने तीर चला दिया यह तीर जाकर सीधे गियासुद्दीन गौरी के सीने पर जा लगा और उसे मरते देर ना लगी।


इसके पश्चात पृथ्वी राज चौहान और राजकवी चंदबरदाई ने एक दूसरे को बघनख (छूरी) से मार कर प्राणों का बलिदान दे दिया। 1206 में खोखर के जाटों द्वारा मोहम्मद गौरी की भी हत्या कर दी गई।


पृथ्वीराज चौहान को सबक सिखाने के लिए गियासुद्दीन गौरी और पृथ्वीराज चौहान की कब्र एक साथ बनाई गई, जब भी मुस्लिम श्रद्धालु गियासुद्दीन गौरी की कब्र पर जाते हैं तो पहले वह पृथ्वीराज चौहान की बाहर बनी कब्र को जूतों से मारते हैं जूते वहां पहले से रख दिए गए हैं। वे अल्लाह से प्रार्थना करते हैं कि इस काफिर व्यक्ति ने हमारे सुल्तान के साथ विश्वासघात किया और धोखे से उन्हें मौत के घाट उतार दिया।, फिर अन्दर जाकर गयासुद्दीन गौरी की कब्र पर फूल चढ़ाते हैं।



कंधार कांड के समय भारत के विदेश मंत्री जसवंत सिंह अफगानिस्तान के दौरे पर गए वहां भारतीय दूतावास से किसी भारतीय कर्मचारी द्वारा यह सूचना मिली की वीर प्रतापी सम्राट राजा पृथ्वीराज चौहान की कब्र में यहां के निवासी जूते मारते हैं जिस राजा को भारत में पूजा जाता है अतः आप उनकी अस्थियां ले जाएं और भारत सरकार को सूचना दें कि भारत में उनकी भव्य समाधि स्थल बनाई जाए लेकिन वाजपेई सरकार में कतिपय कारणों से संभव नहीं हो सका।


भारत के तिहाड़ जेल में बंद शेर सिंह राणा को पृथ्वीराज चौहान की समाधि के साथ हो रहे बर्ताव की सूचना मिली तो वह तिहाड़ जेल से भाग निकले वहां से वह सीधे नेपाल पहुंचे नेपाल के बाद बांग्लादेश पहुंचे बांग्लादेश से नकली पासपोर्ट बनवा कर दुबई पहुंचे दुबई से फिर वह सीधे अफगानिस्तान पर पहुंचे वहां रात के अंधेरे में चुपके से उन्होंने पृथ्वीराज चौहान की अस्थियां निकाली और भारत लौट आए मम्मी की मदद से उन्होंने गाजियाबाद में पिलखुआ में पृथ्वीराज चौहान का मंदिर बनवाया जहां उनकी अस्थियां आज भी विराजमान है।


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